फेफड़ों के कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर और निराश पैदा हो जाती है. इसे एक ऐसी बीमारी मानी जाती है, जिसमें ठीक होने की संभावना बहुत कम होती है. लेकिन अब मेडिकल सास में हो रही प्रगति इस सोच को बदल रही है. जी हां, बेहतर जांच तकनीकों, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और मरीज के अनुसार तय किए जाने वाले इलाज ने फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे लोगों के लिए नई उम्मीदें पैदा की हैं. ऐसे में अब ये मान लेना सही नहीं होगा कि फेफड़ों के कैंसर का पता चलते ही उम्मीद खत्म हो जाती है. आज इलाज का तरीका पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीक और व्यक्तिगत हो गया है.
इस विषय को लेकर सीके बिड़ला हॉस्पिटल के एसोसिएट डायरेक्टर, पल्मोनोलॉजी एंड क्रिटिकल केयर डॉ. कुलदीप कुमार ग्रोवर कहते हैं कि फेफड़ों के कैंसर के इलाज में अब एक ही तरीका सभी मरीजों पर लागू नहीं किया जाता. ट्यूमर का प्रकार, कैंसर किस स्टेज में है, उसमें मौजूद जेनेटिक बदलाव और मरीज की कुल स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर उपचार की योजना बनाई जाती है. कुछ मरीजों में इलाज कैंसर को पूरी तरह खत्म करने में सफल हो सकता है. वहीं, कई मामलों में इसका उद्देश्य बीमारी को कंट्रोल रखना, उसकी रफ्तार धीमी करना और मरीज की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाना होता है.
नई थेरेपी से बढ़ी उम्मीद
डॉक्टर बताते हैं कि सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी आज भी फेफड़ों के कैंसर के इलाज की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं. लेकिन हाल के कुछ सालों में प्रिसिजन मेडिसिन ने ट्रीटमेंट के नए विकल्प उपलब्ध कराए हैं. टार्गेटेड थेरेपी ऐसी दवाओं पर आधारित होती है, जो कैंसर कोशिकाओं में मौजूद खास जेनेटिक बदलावों को निशाना बनाती हैं. वहीं, इम्यूनोथेरेपी शरीर की इम्यून सिस्टम को कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर उनसे लड़ने में मदद करती है. कई मरीजों में इन ट्रीटमेंट से अच्छे रिजल्ट देखने को मिले हैं.
इसके अलावा वैज्ञानिक पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन पर भी काम कर रहे हैं. इनका उद्देश्य मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली को उसके ट्यूमर की विशेषताओं को पहचानने और कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने के लिए तैयार करना है. हालांकि, ये तकनीकें अभी रिसर्च और क्लीनिकल ट्रायल के चरण में हैं, इसलिए इन्हें अभी हर मरीज के लिए निश्चित इलाज नहीं माना जा सकता.


































