बाकू: भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर शुक्रवार 23 अक्टूबर को अजरबैजान के दौरे पर पहुंचे। यह 8 सालों में यह किसी भारतीय विदेश मंत्री का अजरबैजान का पहला और स्वतंत्र द्विपक्षीय दौरा है। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री बायरामोव से मुलाकात की। बातचीत में दोनों देशों ने राजनीतिक, आर्थिक और लोगों के बीच संबंध बनाने पर चर्चा की। इस दौरान जयशंकर ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में ऐतिहासिक फायर टेंपल (अग्नि मंदिर) का दौरा किया।
जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, "बाकू में ऐतिहासिक अतिशगाह फायर टेंपल (Ateshgah Fire Temple) का दौरा किया। यह हमारे दोनों लोगों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक है।" जयशंकर ने भारत और अजरबैजान के जिस ऐतिहासिक रिश्ते की बात की उसकी जड़ें प्राचीन जोरोस्ट्रियन (पारसी) परंपराओं से जुड़ी हैं। बाकू का फायर टेंपल उसी परंपरा की कड़ी है।
अजरबैजान को कहा जाता है लैंड ऑफ फायर
अजरबैजान को लैंड ऑफ फायर (आग की जमीन) कहा जाता है। अजरबैजान की संस्कृति और मिथकीय कथाओं में आग गहराई से बसी है। इसकी शुरुआत 3000 साल से भी पहले हुई थी, जब ईरान (प्राचीन फारस) से निकलकर इस काकाशस क्षेत्र में जोरोस्ट्रियन धर्म ने अपनी जड़ें जमाईं। आज भारत में इसे मानने वालों को पारसी के नाम से जाना जाता है।
जोरोस्ट्रियन या पारसी धर्म के मानने वालों के लिए आग बहुत पवित्र चीज है। यह उनके एकमात्र ईश्वर ‘अहुर मज्दा’ के प्रकाश का प्रतीक है। उनके लिए आग आध्यात्मिक और भौतिक जगह के बीच एक पुल का काम करती है। जब इस इलाके में जोरोस्ट्रियन धर्म फैला तो अनेक मंदिर बनाए गए, जिनमें आग हमेशा जलती रहती थी। स्थानीय लोग फारसी में इन आग के मंदिरों को ‘आतिशगाह’ (आग का घर) कहते थे।
बाकू का ऐतिहासिक फायर टेंपल
अजरबैजान का सबसे प्रसिद्ध अग्नि मंदिर सुराखानी का आतिशगाह है, जिसका दौरा भारतीय विदेश मंत्री ने किया। यह बाकू के ठीक पूर्व में स्थित एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। आज यहां आने वाले अधिकांश पर्यटक भारत से आते हैं। इसकी जड़ें ऐतिहासिक संघर्ष से जुड़ी हैं। 7वीं सदी में इस्लाम के विस्तार के बाद फारस और अजरबैजान में जोरोस्ट्रियन धर्म के अनुयायियों को भागना पड़ा।
भारत से पहुंचे व्यापारियों ने बनवाया
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बाकू स्थित सुराखानी का फायर टेंपल अजरबैजान में जोरोस्ट्रियन धर्म के पतन के सदियों बाद बनाया गया था। इसे प्राकृतिक रूप से जल रही आग की लौ के चारों ओर निर्मित किया गया था। इस मंदिर में चार मेहराब हैं, जो एक वेदी की ओर खुलते हैं। इसके ऊपर एक गुंबद है। यह 17वीं सदी में बनाया गया था, जब भारतीय उपमहाद्वीप के व्यापारी सिल्क रोड के जरिए अजरबैजान पहुंचे और अपनी यात्रा के दौरान यहां रुके थे।


































