बैठक में गर्मियों में पानी की कमी, बारिश के दौरान जलभराव, पेयजल में सीवेज के पानी के मिश्रण और जल के कम पुन: उपयोग जैसी समस्याओं पर विस्तार से विचार किया गया। बोरवेल रिचार्ज शाफ्ट का तत्काल निर्माण शुरू करने और प्राक्कलन के आदान-प्रदान के बाद आवश्यक स्वीकृति प्रक्रिया जल्द पूरी करने पर भी जोर दिया गया।
GIS से होगी जल निकासी और भूजल क्षमता की पहचान
परियोजना के तहत GIS और आधुनिक तकनीक के जरिए भिलाई के प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का अध्ययन किया जाएगा। जलभराव वाले क्षेत्रों की पहचान कर कम लागत वाले वैज्ञानिक समाधान सुझाए जाएंगे। इसके साथ ही सीवेज और जलापूर्ति लाइनों की स्थिति का अध्ययन तथा समस्या वाले क्षेत्रों का चिन्हांकन किया जाएगा।
GIS आधारित भूजल मानचित्रण के जरिए उन क्षेत्रों की पहचान की जाएगी, जहां भूजल पुनर्भरण की क्षमता सबसे अधिक है। ऐसे स्थानों पर कम लागत वाली रिचार्ज संरचनाएं विकसित करने के सुझाव दिए जाएंगे।
2027-28 के मानसून से पहले संरचनाएं पूरी करने का लक्ष्य
बैठक में सतही जल पर निर्भरता बढ़ाने, रासायनिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों की पहचान और वैज्ञानिक उपचार, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में सुधार तथा जल संरक्षण को लेकर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता पर भी चर्चा हुई।
‘जल रक्षा भिलाई’ की कार्ययोजना को समयबद्ध तरीके से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। आवश्यक जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण 2027-28 के मानसून से पहले पूरा करने की योजना है। इसके लिए डीपीआर तैयार करने, स्वीकृति और निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी।
इस पहल का ध्येय वाक्य है, “जल रक्षा भिलाई — सतत भविष्य के लिए विज्ञान-आधारित जल सुरक्षा।” निगम, IIT भिलाई और CGWB का संयुक्त प्रयास शहर में दीर्घकालिक जल सुरक्षा, बेहतर जल प्रबंधन और पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
बैठक में गर्मियों में पानी की कमी, बारिश के दौरान जलभराव, पेयजल में सीवेज के पानी के मिश्रण और जल के कम पुन: उपयोग जैसी समस्याओं पर विस्तार से विचार किया गया। बोरवेल रिचार्ज शाफ्ट का तत्काल निर्माण शुरू करने और प्राक्कलन के आदान-प्रदान के बाद आवश्यक स्वीकृति प्रक्रिया जल्द पूरी करने पर भी जोर दिया गया।
GIS से होगी जल निकासी और भूजल क्षमता की पहचान
परियोजना के तहत GIS और आधुनिक तकनीक के जरिए भिलाई के प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का अध्ययन किया जाएगा। जलभराव वाले क्षेत्रों की पहचान कर कम लागत वाले वैज्ञानिक समाधान सुझाए जाएंगे। इसके साथ ही सीवेज और जलापूर्ति लाइनों की स्थिति का अध्ययन तथा समस्या वाले क्षेत्रों का चिन्हांकन किया जाएगा।
GIS आधारित भूजल मानचित्रण के जरिए उन क्षेत्रों की पहचान की जाएगी, जहां भूजल पुनर्भरण की क्षमता सबसे अधिक है। ऐसे स्थानों पर कम लागत वाली रिचार्ज संरचनाएं विकसित करने के सुझाव दिए जाएंगे।
2027-28 के मानसून से पहले संरचनाएं पूरी करने का लक्ष्य
बैठक में सतही जल पर निर्भरता बढ़ाने, रासायनिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों की पहचान और वैज्ञानिक उपचार, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में सुधार तथा जल संरक्षण को लेकर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता पर भी चर्चा हुई।
‘जल रक्षा भिलाई’ की कार्ययोजना को समयबद्ध तरीके से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। आवश्यक जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण 2027-28 के मानसून से पहले पूरा करने की योजना है। इसके लिए डीपीआर तैयार करने, स्वीकृति और निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी।
इस पहल का ध्येय वाक्य है, “जल रक्षा भिलाई — सतत भविष्य के लिए विज्ञान-आधारित जल सुरक्षा।” निगम, IIT भिलाई और CGWB का संयुक्त प्रयास शहर में दीर्घकालिक जल सुरक्षा, बेहतर जल प्रबंधन और पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
































