धार: जिले की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में सोमवार को इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ के सामने कड़े तर्क रखे गए। इंटरवेनर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की कार्यप्रणाली और उनके द्वारा कोर्ट में पेश किए गए हलफनामों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि ASI कोर्ट को गुमराह नहीं कर सकता— कभी इसे मस्जिद कहा जाता है, कभी मंदिर नहीं, और अब इसे मंदिर बताया जा रहा है।
‘एक ही टेबल पर लिखी गई दलीलें’
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच के सामने एडवोकेट मेनन ने कोर्ट का ध्यान इस ओर खींचा कि राज्य सरकार और ASI की दलीलों में अजीब समानताएं हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, ‘ऐसा लगता है जैसे कुछ पैराग्राफ एक ही टेबल पर बैठकर और एक ही सोर्स से लिखे गए हों।’ उन्होंने 98 दिनों की सर्वे रिपोर्ट को भी ‘स्केची’ यानी अधूरा करार दिया और कहा कि यह रिपोर्ट केवल ऐतिहासिक व्याख्याओं पर आधारित है, जो ठोस सबूत नहीं हो सकते।
इतिहास और अधिकार क्षेत्र पर बहस
मेनन ने तर्क दिया कि 1955 से पहले इस स्मारक के भीतर हिंदुओं द्वारा पूजा या समारोह आयोजित करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने याचिकाकर्ताओं की ‘लोकल स्टैंड’ पर भी सवाल उठाया और कहा कि यूपी, धार और भोपाल से आए इन लोगों ने खुद को ‘सोशल वर्कर’ बताया है, लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं दिया। उनके अनुसार, यह मामला मालिकाना हक का है, जिसे केवल सिविल कोर्ट ही तय कर सकता है, न कि हाई कोर्ट में आर्टिकल 226 के तहत दी गई रिट याचिका।






































