अबू धाबी/रियाद/वॉशिंगटन: भारत में सितम्बर 2023 में हुए G-20 शिखर सम्मेलन के दौरान इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर (IMEC) की योजना का ऐलान किया गया था। मिडिल ईस्ट के रास्ते भारत को यूरोप से जोड़ने वाले इस कॉरिडोर को चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन उसके बाद इजरायल का गाजा सैन्य अभियान शुरू होने के बाद यह योजना पीछे चली गई। अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन के बाद तीन साल पुराने इस प्रोजेक्ट ने फिर से ध्यान खींचा है।
ट्रंप ने इस कॉरिडोर के लिए समर्थन ऐसे समय में किया है, जब ईरान के साथ अमेरिका का टकराव चल रहा है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होने वाले समुद्री जलमार्ग को प्रभावी रूप से रोक रखा है। ईरानी सेना और IRGC इस संकरे चोकपॉइंट्स से गुजरने वाले जहाजों पर हमले कर रहे हैं। ट्रंप ने IMEC के लिए अपना समर्थन देते हुए मिडिल ईस्ट के ऊर्जा ढांचे को जोखिम भरे समुद्री रास्तों से दूर ले जाने पर जोर दिया।
IMEC को ट्रंप का समर्थन
ट्रंप ने 22 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान खाड़ी देशों के नेताओं के साथ अलग बैठक की थी। इस दौरान उन्होंने कहा कि "पड़ोसी देशों में कमर्शियल शिपिंग पर ईरान के आतंकवादी हमलों ने मिडिल ईस्ट के ऊर्जा ढांचे को ईरानी चेकपॉइंट्स से दूर ले जाने की अहमियत को दिखाया है। इसलिए मेरा प्रशासन इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर और तेल निकालने के अन्य तरीकों का समर्थन करता है।"
ईरान युद्ध ने सामने ला दी कमजोरी
अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान के बाद IMEC को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि इस क्षेत्रीय टकराव ने IMEC की कमजोरी को भी उजागर किया है। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के पॉलिसी फेलो अल्बर्टो रिजी का कहना है कि "कोई ट्रेड कॉरिडोर कितना मजबूत हो सकता है, अगर उसके मुख्य गेटवे उन्हीं चोकपॉइंट्स पर निर्भर हों जिनसे बचने के लिए उसे बनाया गया था?" रिजी ने कहा कि ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज के बंद होने से इस प्रोजेक्ट का दायरा पहले ही बदल रहा था।
भारत वाले हिस्से में कॉरिडोर पर खतरा
रिजी का कहना है कि इस संकट ने IMEC को ऐसे नेटवर्क में बदलने की जरूरत को मजबूत कर दिया है, जिसमें बैकअप या वैकल्पिक रास्ते मौजूद हों। SCMP से उन्होंने कहा, एक अकेले रास्ते में आसानी से रुकावट आ सकती है, जबकि रास्तों का एक नेटवर्क रुकावटों को बेहतर ढंग से सामना कर सकता है।
यह कमजोरी IMEC के पूर्वी समुद्री हिस्से में सबसे ज्यादा दिखती है। यह हिस्सा भारतीय बंदरगाहों को UAE के बंदरगाहों जबाल अली और खलीफा से जोड़ता है। इसके बाद कार्गो जमीन के रास्ते UAE, सऊदी अरब और जॉर्डन से होते हुए इजरायल और उसके आगे समुद्र से यूरोप पहुंचता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से कैसे होगा पार
UAE के बंदरगाह फारस की खाड़ी के अंदर स्थित हैं। इसका मतलब है कि भारत से आने वाले हर कार्गों को होर्मुज जलडमरूमध्य से ही आगे बढ़ना होगा, जो क्षेत्रीय संघर्ष की चपेट में है। वहीं, भूमध्य सागर तक जाने वाला पश्चिमी कॉरिडोर का पश्चिमी गेटवे इजरायल का हाइफा भी संघर्ष की चपेट में है। ईरान के साथ टकरावों ने इन कमजोरियों को खोलकर रख दिया है।
IMEC के लिए वैकल्पिक गेटवे
कुछ एक्सपर्ट IMEC के भौगोलिक दायरे में विविधता लाने पर जोर देते हैं। अटलांटिक काउंसिल में प्रोजेक्ट फॉर मिडिल ईस्ट इंटीग्रेशन के फेलो अफाक हुसैन का कहना है कि यह सिर्फ एक लाइन वाला कॉरिडोर नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसे कॉरिडोर के नेटवर्क में बदलने से यह ज्यादा सुरक्षित होगा और जोखिम भी बंट जाएगा। उन्होंने कहा कि इसमें ओमान में सलालाह जैसे बंदरगाहों शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही जॉर्डन के रास्ते मिस्र या सीरिया से गुजरने वाले रूट बन सकते हैं।






























