इंदुभूषण: किसी अस्पताल की इंटेंसिव केयर यूनिट ( ICU ) के बाहर बैठा व्यक्ति अपने परिजन के इलाज की चिंता कर रहा होता है, न कि कीमतों पर मोलभाव। अस्पताल द्वारा 11.05 रुपये में खरीदा गया आईवी सेट 325 रुपये और 29.41 रुपये का कैथेटर 310 रुपये में बेचना सवाल खड़े करता है। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की जांच में कुछ अस्पतालों में सामान की कीमत 2,841% तक ज्यादा मिलीं। केंद्र ने राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) से रिपोर्ट मांगी है।
अलग स्थिति: नियम समस्या के लिहाज से होने चाहिए। स्टैंडर्ड सामान पर बहुत ज्यादा मार्जिन एक समस्या है, लेकिन जटिल बीमारियों के इलाज की कीमत तय करना दूसरा मामला है। स्वास्थ्य पर संसद की स्थायी समिति ने भी जरूरी प्रक्रियाओं, जांच पर सीमा लगाने और कुछ इलाज के लिए तय पैकेज की सिफारिश की है। समस्या यह है कि हर मरीज का इलाज एक जैसा नहीं होता। अस्पतालों की सुविधाएं, स्टाफ, तकनीक और इलाज की जटिलता भी अलग होती है। इसलिए आईवी सेट जैसी चीजों और जटिल इलाज को एक नजर से नहीं देखा जा सकता।
पूरी जानकारी: हॉस्पिटल के चार्ज पारदर्शी होने चाहिए। हर हॉस्पिटल को डिजिटल फॉर्मेट में शुल्क की सूची जारी करनी चाहिए। तय इलाज के लिए मरीज को फीस, जांच, दवाओं, डिवाइस, सामान और कमरे का अनुमान पहले ही दिया जाना चाहिए। अंतिम बिल अगर अनुमानित कीमत से अत्यधिक हो तो इसकी वजह बतानी चाहिए। दवाओं, इम्प्लांट और दूसरे सामान पर बहुत ज्यादा मार्जिन की जांच होनी चाहिए। खरीद, भंडारण और बर्बादी की उचित लागत ली जा सकती है। लेकिन, हर मामले में कीमतों में पारदर्शिता जरूरी है।
बड़ी बचत: बेहतर खरीद से भी बड़ी बचत की गुंजाइश रहती है। संसदीय समिति ने टाटा मेमोरियल सेंटर का उदाहरण दिया है। 23 सेंटरों में 40 कैंसर दवाओं की सामूहिक खरीद से अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के मुकाबले 1,320 करोड़ रुपये की बचत हुई और औसत बचत 82% रही। इसके अलावा, इलाज की जरूरत पर भी निगरानी होनी चाहिए। सिर्फ कीमत घटाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। ज्यादा जांच, लंबे समय तक भर्ती और अतिरिक्त इलाज से कमाई बढ़ सकती है। इसलिए हर जांच या प्रक्रिया का मरीज के लिए जरूरी होना भी देखा जाना चाहिए।
इंदुभूषण: किसी अस्पताल की इंटेंसिव केयर यूनिट ( ICU ) के बाहर बैठा व्यक्ति अपने परिजन के इलाज की चिंता कर रहा होता है, न कि कीमतों पर मोलभाव। अस्पताल द्वारा 11.05 रुपये में खरीदा गया आईवी सेट 325 रुपये और 29.41 रुपये का कैथेटर 310 रुपये में बेचना सवाल खड़े करता है। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की जांच में कुछ अस्पतालों में सामान की कीमत 2,841% तक ज्यादा मिलीं। केंद्र ने राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) से रिपोर्ट मांगी है।
अलग स्थिति: नियम समस्या के लिहाज से होने चाहिए। स्टैंडर्ड सामान पर बहुत ज्यादा मार्जिन एक समस्या है, लेकिन जटिल बीमारियों के इलाज की कीमत तय करना दूसरा मामला है। स्वास्थ्य पर संसद की स्थायी समिति ने भी जरूरी प्रक्रियाओं, जांच पर सीमा लगाने और कुछ इलाज के लिए तय पैकेज की सिफारिश की है। समस्या यह है कि हर मरीज का इलाज एक जैसा नहीं होता। अस्पतालों की सुविधाएं, स्टाफ, तकनीक और इलाज की जटिलता भी अलग होती है। इसलिए आईवी सेट जैसी चीजों और जटिल इलाज को एक नजर से नहीं देखा जा सकता।
पूरी जानकारी: हॉस्पिटल के चार्ज पारदर्शी होने चाहिए। हर हॉस्पिटल को डिजिटल फॉर्मेट में शुल्क की सूची जारी करनी चाहिए। तय इलाज के लिए मरीज को फीस, जांच, दवाओं, डिवाइस, सामान और कमरे का अनुमान पहले ही दिया जाना चाहिए। अंतिम बिल अगर अनुमानित कीमत से अत्यधिक हो तो इसकी वजह बतानी चाहिए। दवाओं, इम्प्लांट और दूसरे सामान पर बहुत ज्यादा मार्जिन की जांच होनी चाहिए। खरीद, भंडारण और बर्बादी की उचित लागत ली जा सकती है। लेकिन, हर मामले में कीमतों में पारदर्शिता जरूरी है।
बड़ी बचत: बेहतर खरीद से भी बड़ी बचत की गुंजाइश रहती है। संसदीय समिति ने टाटा मेमोरियल सेंटर का उदाहरण दिया है। 23 सेंटरों में 40 कैंसर दवाओं की सामूहिक खरीद से अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) के मुकाबले 1,320 करोड़ रुपये की बचत हुई और औसत बचत 82% रही। इसके अलावा, इलाज की जरूरत पर भी निगरानी होनी चाहिए। सिर्फ कीमत घटाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। ज्यादा जांच, लंबे समय तक भर्ती और अतिरिक्त इलाज से कमाई बढ़ सकती है। इसलिए हर जांच या प्रक्रिया का मरीज के लिए जरूरी होना भी देखा जाना चाहिए।































