इस्लामाबाद: शहबाज शरीफ की सरकार ने पिछले रविवार को खैबर-पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत में ‘आपातकाल’ लगाते हुए पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की सरकार को बर्खास्त कर दिया है। पीटीआई के प्रमुख इमरान खान हैं जिन्हें जेल से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है। केपीके में गवर्नर रूल यानि राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है। केपीके वो प्रांत है जहां सेना की लाख कोशिशों के बाद भी इमरान खान की पार्टी नहीं हारी थी इसीलिए इसे इमरान खान का गढ़ कहा जाता है।
1- सरकार बर्खास्त करने से राजनीतिक विकल्प खत्म
केपीके वर्षों से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानि TTP के आतंक से भी जूझता आ रहा है। इसीलिए सवाल उठ रहे है कि क्या एक देश की एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर असीम मुनीर ने पाकिस्तान को एक अंतहीन तबाही की आग में झोंक दिया है? ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान पहले से ही कई मोर्चों पर जूझ रहा है और राजनीतिक विकल्प खत्म होने के बाद अब आशंका है कि केपीके भी बलूचिस्तान के रास्ते पर चलकर एक स्वतंत्र देश की मांग कर सकता है।
2- इमरान खान का देश छोड़ने से इनकार
इमरान खान ने देश छोड़ने और यूरोप या सऊदी जाने के विकल्प को ठुकराते हुए जेल में रहने का फैसला किया है। असीम मुनीर के लिए ये सबसे बड़ी मुसीबत है। असीम मुनीर का आरोप है कि इमरान खान की पार्टी की सरकार आतंकवाद पर लगाम लगाने में नाकाम रही है। टीटीपी को अफगानिस्तान से मदद मिलती है। हालांकि पाकिस्तानी सेना ने कई तरह के ऑपरेशन चलाए और सैकड़ों बेगुनाहों को भी मारा। लेकिन अंत में उसने प्रांतीय सरकार पर सारा दोष मढ़ दिया। जबकि पाकिस्तानी सेना ने पिछले 25 वर्षों में केपीके में 16 से ज्यादा आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन चलाए हैं और हर एक ऑपरेशन नाकाम रहा है।
3- ग्रेटर पश्तूनिस्तान का हिस्सा है खैबर पख्तूनख्वा
KPK के पश्तूनों के बीच इमरान खान की लोकप्रियता और अफगानिस्तान के तालिबान से मिलने वाले समर्थन क्योंकि यह ‘ग्रेटर पश्तूनिस्तान’ का हिस्सा है की वजह से KPK में पहले ही हिंसा भड़क चुकी है। यह इलाका भी पड़ोसी बलूचिस्तान की तरह एक ‘सिक्योरिटी स्टेट’ बन सकता है जहां रावलपिंडी और खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) का पूरा दबदबा होगा। इसका मतलब है कि बलूचिस्तान की तरह KPK में भी भविष्य में इस्लामाबाद के खिलाफ बगावत हो सकती है और पाकिस्तानी सेना को आपस में लड़ने वाले पश्तून कबीलों के दबदबे वाले इस अशांत इलाके में उलझना पड़ सकता है।
4- अफगानिस्तान से और खराब होंगे रिश्ते
KPK में इमरजेंसी लगाने से तालिबान-शासित अफगानिस्तान के साथ मुनीर के रिश्ते और खराब हो जाएंगे क्योंकि काबुल हमेशा खैबर दर्रे के उस पार रहने वाले अपने पश्तून भाइयों को नैतिक समर्थन देता रहा है। तालिबान ‘डूरंड लाइन’ को नहीं मानता और दोनों देशों के बीच तथाकथित अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तोर्खम से स्पिन बोल्डक तक सैन्य झड़पें आम बात हैं। TTP के खिलाफ आतंकवाद-रोधी अभियानों के नाम पर अफ़गानिस्तान पर बमबारी करके मुनीर ने उस देश के साथ रिश्ते पहले ही खराब कर लिए हैं जिसे पाकिस्तान कभी अपनी ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ यानि रणनीतिक गहराई मानता था।
5- भारत ने खत्म नहीं किया है ऑपरेशन सिंदूर
2025 के पहलगाम नरसंहार के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया था और ये अभी खत्म नहीं हुआ है। इसीलिए पाकिस्तान पहले ही भारत के मोर्चे पर फंसा है। इसलिए पाकिस्तान अपने पूर्वी मोर्चे पर भी कमजोर स्थिति में है। तालिबान के शासन वाला अफगानिस्तान पहले ही पाकिस्तान के खिलाफ नफरत पाले बैठा है। और इस वजह से इस्लामाबाद का पश्चिमी मोर्चा भी खुल गया है। पाकिस्तान में बलूचिस्तान जैसी सक्रिय विद्रोही गतिविधियां चल रही हैं। अब KPK में भी हालात बिगड़ सकते हैं जिससे सिंधु नदी के पश्चिम में आंतरिक सुरक्षा की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।






























