हमारे पानी की क्वालिटी, लंबे समय से लगी पाइपलाइन और जमीन के पानी के दूषित होने की चिंताओं के बीच अक्सर एक सवाल खड़ा होता है कि क्या पीने का पानी आपके ब्लड प्रेशर की समस्या बढ़ा सकता है। हालांकि, इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट होने के नाते मैं आपको बता दूं कि यह ना समझें कि टैप वॉटर सीधे तौर पर हाइपरटेंशन का कारण बन सकता है। आमतौर पर इस बीमारी के पीछे कई सारे आपस में जुड़े फैक्टर होते हैं, जैसे जेनेटिक्स, अत्यधिक नमक का सेवन, मोटापा, फिजिकल इनएक्टिविटी, उम्र, तनाव, किडनी डिजीज और कुछ दवाओं का सेवन।
इसके साथ ही पीने के पानी में कुछ दूषित पदार्थ लंबे समय तक रहने से भी कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है। खासकर ऐसे एरिया में जहां जमीन के अंदर का पानी या वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर दूषित हो।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टैप वॉटर पीने वाले हर व्यक्ति को हाइपरटेंशन होने का खतरा है। क्लिनिकल प्रैक्टिस में मैं हाई डाइटरी सोडियम, मोटापा, डायबिटीज, स्मोकिंग, फैमिली हिस्ट्री और सेडेंट्री लाइफस्टाइल जैसे कंवेंशनल रिस्क फैक्टर को इस बीमारी के विकास में ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। इनके साथ लोकल वॉटर सोर्स का दूषित होना या अनुपचारित ग्राउंड वॉटर के लंबे समय तक संपर्क में रहना इस बीमारी के खतरे को बढ़ा सकता है।
क्या हाई बीपी के मरीजों को अपना पानी टेस्ट करवाना चाहिए?
हाइपरटेंशन के हर मरीज को अपने घर का पानी टेस्ट करवाने की जरूरत नहीं है। हाई ब्लड प्रेशर की पुष्टि होने पर मरीज को सबसे पहले रेगुलर बीपी मॉनिटरिंग, नमक का इनटेक घटाना, हेल्दी वेट मेंटेन करना, एक्सरसाइज करना, डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं और कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर जैसे उपायों पर फोकस करना चाहिए।
हालांकि, वॉटर टेस्टिंग एक समझदारी भरा काम है। अगर आपको अपने एरिया या घर के वॉटर सोर्स के दूषित होने का शक हो तो आप इसके बारे में सोच सकते हैं। याद रखें कि पानी को केवल उसके दिखने, स्वाद या महक के आधार पर सही नहीं मान लेना चाहिए, क्योंकि कुछ खराब केमिकलों से पानी के अंदर कोई भी बड़ा अंतर पैदा नहीं होता है।
आर्सेनिक उन जगहों पर महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां ग्राउंड वॉटर में प्राकृतिक रूप से इसका हाई लेवल मौजूद हो। इसका लंबे समय तक संपर्क रहने से स्किन खराब हो सकती है और कैंसर से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं और साथ ही कार्डियोवैस्कुलर डिजीज का खतरा हो सकता है।
हालांकि इन दूषित पदार्थों की मौजूदगी का यह सीधा मतलब नहीं है कि इससे हाइपरटेंशन की बीमारी विकसित होगी ही। खतरा इनकी कंसंट्रेशन, संपर्क का वक्त और व्यक्तिगत संवेदनशीलता पर होता है।
क्या ज्यादा फिल्ट्रेशन भी नुकसानदायक है?
ज्यादा फिल्ट्रेशन का मतलब हर बार ज्यादा सुरक्षा नहीं होती। कुछ ट्रीटमेंट सिस्टम उन मिनरल्स और तत्वों को भी हटा देते हैं, जो सामान्य स्तर पर नुकसानदायक नहीं होते। साथ ही इनकी मेंटेनेंस भी एक समस्या है। अगर फिल्टर को समय पर साफ या बदला ना जाए तो यह माइक्रोबियल ग्रोथ का कारण बन सकते हैं।
हाइपरटेंशन के मरीज को असल में क्या करना चाहिए?
अगर आपको हाइपरटेंशन है तो तुरंत अपने पीने के पानी को दोष मत दीजिए। धीरे-धीरे प्रामाणित उपायों को अपनाएं, जैसे नमक का कम सेवन, बॉडी वेट हेल्दी रखना, रेगुलर एक्सरसाइज करना, तंबाकू से दूरी, ऐल्कोहॉल से दूरी, पर्याप्त नींद लेना और डॉक्टर की बताई दवा लेना।
इसके साथ ही अगर आप ऐसे एरिया में रहते हैं, जहां का पानी दूषित हो सकता है तो एक विश्वसनीय लैब से पानी का टेस्ट करवाइए और उसके रिजल्ट के मुताबिक अपने लिए सही ट्रीटमेंट सिस्टम चुनिए। साफ संदेश यह है कि दिल की सेहत के लिए पानी का स्वच्छ होना जरूरी है, लेकिन इसके चक्कर में हमें प्रमुख रिस्क फैक्टर को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।































