भोपाल, लोकायुक्त पुलिस ने भोपाल नगर निगम के अपर आयुक्त (वित्त) गुणवंत सेवतकर समेत अन्य अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आपराधिक साजिश की धाराओं में केस दर्ज किया है। जांच के बाद यह एफआईआर दर्ज की गई है।
एसपी लोकायुक्त भोपाल दुर्गेश राठौर ने बताया कि निगम में पदस्थ अपर आयुक्त (वित्त) और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत मिली थी। आरोप था कि निगम के विभिन्न विभागों में वाहनों की पेंटिंग, मरम्मत और अन्य कार्यों के नाम पर फर्जी ई-बिल तैयार कर भुगतान लिया जा रहा है।
शिकायत मिलने के बाद लोकायुक्त पुलिस ने तकनीकी जांच कराई। प्रारंभिक जांच में कई तथ्य सही पाए जाने पर अपर आयुक्त समेत अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में संबंधित विभागों को ही जानकारी नहीं थी कि उनके नाम से फाइल बनाकर भुगतान किया गया है।
एफआईआर दर्ज होने के बाद लोकायुक्त पुलिस ने अदालत से सर्च वारंट लेकर शुक्रवार को नगर निगम के सर्वर सेंटर में सर्च एंड सीजर कार्रवाई की। इस दौरान एसएपी सॉफ्टवेयर से जुड़ी हार्ड डिस्क जब्त की गई हैं। तकनीकी डेटा सुरक्षित करने के लिए राज्य साइबर पुलिस की टीम को भी साथ लिया गया। इसके अलावा क्लाउड डेटा जुटाने के लिए एक टीम एसईडीसी भेजी गई है। लोकायुक्त पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।
गड़बड़ी: बिना काम कराए ई-बिल से भुगतान
आरोप है कि नगर निगम के जलकार्य, सामान्य प्रशासन और केंद्रीय वर्कशॉप जैसे विभागों के नाम पर वाहनों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य काम दिखाए गए। कई मामलों में वास्तव में काम हुआ ही नहीं, लेकिन सिस्टम में ई-बिल तैयार कर दिए गए। कुछ मामलों में जिस विभाग के नाम से बिल बनाए गए, उन्हें ही इसकी जानकारी नहीं थी।
जांच में ऐसे सामने आया फर्जीवाड़ा
लोकायुक्त पुलिस का कहना है कि नगर निगम की वित्तीय प्रणाली SAP सॉफ्टवेयर से चलती है। इसी सिस्टम में काम दिखाकर ई-बिल जनरेट किए गए। जांच में सामने आया कि अलग-अलग मद बनाकर बिलों में हेरफेर की गई, ताकि भुगतान वैध लगे। ई-बिल बनने के बाद सिस्टम से भुगतान प्रक्रिया पूरी कराई गई। भुगतान के बाद पैसा परिचितों और रिश्तेदारों की फर्मों के खातों में ट्रांसफर किया गया। लोकायुक्त के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया के बदले कमीशन भी लिया जाता था। लोकायुक्त ने नगर निगम के सर्वर से SAP सॉफ्टवेयर की हार्ड डिस्क जब्त कर डिजिटल डेटा की जांच शुरू की है।
फर्जी ई-बिल से नहीं होता भुगतान…
टेंडर जारी करने वाले विभाग में पहले वर्क ऑर्डर, बिल और काम का सत्यापन विभागाध्यक्ष करते हैं। इसके बाद बिल कंप्यूटर सॉफ्टवेयर से लेखा शाखा में आता है। यहां आंकड़ों की जांच के बाद बिल ऑडिट शाखा को भेजा जाता है। ऑडिट सत्यापन के बाद ही भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। – गुणवंत सेवतकर, अपर आयुक्त वित्त, ननि

































