नई दिल्ली: क्रिटिकल मिनरल्स … ऐसे दुर्लभ खनिज जिनकी दुनिया के हर बड़े देश को जरूरत है। लेकिन यह सिर्फ गिने-चुने देशों में ही मिलते हैं। ये मिनरल्स किसी खजाने से कम नहीं हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक चीजों से लेकर, ईवी, रॉकेट और फाइटर जेट तक बनाने में होता है। भारत के साथ अमेरिका को भी इसकी काफी जरूरत पड़ती है। अमेरिका भी इसके लिए आयात पर काफी निर्भर है। इसे एक्सपोर्ट करने में चीन पहले स्थान पर है। लेकिन समय-समय पर चीन इसके एक्सपोर्ट को रोकता रहता है। अब इसकी सप्लाई के लिए अमेरिका ने चिली का रुख किया है।
एक तरफ जहां दुनिया ईरान-इजरायल युद्ध के कारण कच्चे तेल और गैस की कमी का सामाना कर रही है, वहीं अमेरिका चुपचाप क्रिटिकल मिनरल्स का खजाना बढ़ाने पर लगा है। ऑयलप्राइसडॉटकॉम के मुताबिक चीन से बात पूरी तरह न बनने पर अमेरिका अब चिली के साथ महत्वपूर्ण खनिज रेनियम (Rhenium) की सप्लाई के लिए समझौते पर बातचीत कर रहा है।
क्या है रेनियम और क्यों है खास?
- रेनियम एक बेहद दुर्लभ धातु है। इसका गलनांक (मेल्टिंग पॉइंट) करीब 3180 डिग्री सेल्सियस है।
- ऐसे में यह डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री के लिए बेहद अहम बन जाता है।
- एक्सपर्ट्स के अनुसार यह धातु सैन्य टर्बाइन और एयरक्राफ्ट इंजन को बहुत अधिक तापमान में भी सुरक्षित और मजबूत बनाए रखती है।
चिली का कितना दबदबा?
चिली दुनिया का सबसे बड़ा रेनियम उत्पादक है। वैश्विक सप्लाई का करीब 50% हिस्सा चिली के कंट्रोल में है। चूंकि रेनियम मुख्य रूप से तांबा (कॉपर) माइनिंग का बाय-प्रोडक्ट है और चिली कॉपर प्रोडक्शन में भी नंबर-1 है, इसलिए उसकी भूमिका और मजबूत हो जाती है।






































