गुजरे जमाने के फेमस एक्टर और डायरेक्टर मनोज कुमार को फैन्स ‘भारत कुमार’ कहते थे और इसके पीछे उनकी फिल्मों में उनका देशभक्ति वाले किरदार की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने ‘पूरब और पश्चिम’, ‘उपकार’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्मों में कुछ इसी तरह के किरदार निभाए जिसकी वजह से उनके साथ देशभक्ति का टैग लग गया।
मनोज कुमार ने एक बार अपनी ये कहानी खुद सुनाई थी। भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा था, ‘सन 1946-47 में मैं लाहौर में था। तब वहां आजाद हिंद फौज के जुलूस निकलते थे। उनके 3 बड़े सैनिक सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज कैद थे। लाल किले में उन पर मुकदमा चल रहा था। नारा था- लाल किले से आई आवाज, सहगल ढिल्लों और शाहनवाज। मैं भी उस जुलूस में नारे लगाता था। पुलिस ने मुझे भी पकड़ लिया। आधे पौने घंटे बाद डांट-डपट कर छोड़ दिया।’
मनोज कुमार ने कहा था- पिता जी ने मुझे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कहानी सुनाई
उन्होंने अपनी ये कहानी आगे बढ़ाते हुए कहा था, ‘ घर पहुंचा तो पिताजी ने पूछा कि थानेदार का फोन आया था। क्या बात हो गई? मैंने उन्हें भी वह नारा सुना दिया। पिताजी ने पूछा भी कौन हैं ये लोग? मैंने कहा- मुझे नहीं पता। तो उन्होंने मुझे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कहानी सुनाई। तब मेरी उम्र 9 साल थी। आजादी के दीवानों को लेकर वह मेरा पहला इम्प्रेशन था, जो मेरे जहन में उस समय से ही रच-बस गया था, जो आगे मेरी फिल्मों में उतरकर आया।’
पिताजी उस समय लाहौर के उस इलाके के पीस कमेटी के प्रेसिडेंट थे
उन्होंने बताया था कि उसके बाद से दंगे शुरू हो गए और बंटवारा हो गया। मनोज कुमार ने तब का दौर याद करते हुए बताया कि उनके पिताजी उस समय लाहौर के उस इलाके के पीस कमेटी के प्रेसिडेंट होते थे। उन्होंने कहा, ‘कई खूनी जख्मों को सहने के बाद हमारा परिवार खून से लथपथ दिल्ली पहुंच गया। पिताजी को दिल्ली रिफ्यूजी कैंप का भी प्रेसिडेंट चुना गया। फिर पता लगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू कैंप आने वाले हैं। वो आए और अगले दिन एक अंग्रेजी अखबार के फ्रंट पेज पर नेहरू जी की फोटो थी और साइड में मेरे पिताजी भी थे।’
‘नेहरू जी का बयान था- मैं रिफ्यूजी कैंप गया था’
मनोज कुमार ने बताया, ‘उस अखबार में नेहरू जी का बयान था- मैं रिफ्यूजी कैंप गया था और वहां कैंप के प्रेसिडेंट ने कहा कि पंडित जी, पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। बोलिए, आपको कितने जवान चाहिए? मैं तो खुद कैंप वालों को कुछ देने गया था पर उनके प्रेसिडेंट ने मुझे ही देने की पेशकश की तो मेरे जेहन में ख्याल आया कि यह जो लोग अपने घर-बार, खेत-खलिहान छोड़कर आए हैं, उनमें देशभक्ति का इतना जज्बा है तो हमारा मुल्क जरूर प्रगति करेगा। पंडित जी की यही कही बात मेरे भी जेहन में घर कर गई। अगले दिन पिताजी मुझे लाल किला ले गए और वो दिन 16 अगस्त का दिन था।’
‘एक दिन पहले मेरे पिताजी अपने छोटे भाई की मौत का गम मना रहे थे’
एक्टर ने ये किस्सा बताते हुए आगे बताया कि उस वक्त वहां लाल किला पर नेहरू जी भाषण दे रहे थे और लोग तालियां बजा रहे थे। उन्होंने कहा, ‘मेरे पिताजी भी तालियां बजा रहे थे। ये सब देख कर मुझे थोड़ा अजीब सा लग रहा था क्योंकि एक दिन पहले मेरे पिताजी अपने छोटे भाई की मौत का गम मना रहे थे और वहां वो भाषण पर तालियां बजा रहे थे।
मेरे पिताजी मुझे लेकर जामा मस्जिद गए और कहा’
इसके बाद उन्हें लेकर उनके पिताजी जामा मस्जिद ले गए। उन्होंने कहा, ‘मेरे पिताजी मुझे लेकर जामा मस्जिद गए और कहा- मत्था टेको। मैंने इनकार किया, जिसके बाद मैंने उनसे कहा- ये तो मुसलमानों की जगह है। फिर पिताजी ने कहा- नहीं बेटे पूजा-पाठ का स्थान एक ही होता है। कोई हिंदू-मुस्लिम नहीं है। वह समय बुरा था जो हुआ। और तब मैंने वहां मस्जिद में मत्था टेका। अगर तब पिताजी ने मेरे साथ वो नहीं किया होता तो शायद मेरे दिल में मुसलमानों के लिए और इस्लाम के लिए घृणा रहती। फिर वही मेरे किरदार में मेरी फिल्मों में भी सबको दिखता।

































