भोपाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने के लिए सार्वजनिक परिवहन अपनाने का आह्वान कर रहे हैं। कोशिश है कि इससे देश की ऊर्जा निर्भरता कम होगी। लेकिन राजधानी में अधिकारियों की बेपरवाही से सार्वजनिक परिवहन की दुर्दशा हो चुकी है। पड़ताल करने पर सामने आया है कि सार्वजनिक परिवहन की स्थिति दुरुस्त होती तो रोजाना 67 लाख रुपये का ईधन बचता।
भोपाल शहर की अनुमानित जनसंख्या 27 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। ऐसे शहर में सार्वजनिक परिवहन सुविधा के नाम पर कभी 300 लो फ्लोर बसों का संचालन शुरू हुआ था। उनसे 24 चिन्हित मार्गों पर रोजाना डेढ़ लाख यात्री सफर करते थे। आज कुछ ही मार्गों पर 70 से भी कम बसों का संचालन हो रहा है।
इनमें रोजाना 16-20 हजार यात्री सफर कर पाते हैं। यानी करीब एक लाख 34 हजार यात्री बेबस हो गए। इन यात्रियों को अब या तो निजी साधनों का उपयोग करना पड़ रहा है या वे फिर आटो रिक्शा या बाइक टैक्सी के भरोसे हैं।
मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) में ट्रांसपोर्ट इंजीनियरिंग विभाग के डा. राहुल तिवारी का कहना है कि एक लो-फ्लोर बस 50 यात्रियों को लेकर एक लीटर डीजल में चार किमी चलती है। अगर बस एक फेरे में 20 किमी का सफर तय करती है, तो कुल पांच लीटर डीजल खर्च होता है। यानी प्रत्येक व्यक्ति पर ईधन खर्च डेढ़ रुपये भी कम आया।
अगर यही 50 यात्री निजी वाहनों से 20 किमी का सफर करें तो प्रत्येक का कम से कम आधा लीटर ईधन खर्च करना होगा। इस हिसाब से 50 लोग 25 लीटर ईंधन खर्च करेंगे। अब अगर 1.34 लाख लोग निजी साधनों से जाएं तो ईधन खर्च 67 हजार लीटर पहुंच जाएगा। अगर 100 रुपये लीटर का औसत मूल्य माने तो रोजाना 67 लाख रुपये का खर्च आएगा।
मेट्रो सिर्फ मनोरंजन का जरिया
भोपाल मेट्रो का संचालन दिसंबर 2025 में शुरू हुआ। पूरा रूट तैयार न होने के कारण यह फिलहाल आम आदमी के काम की नहीं है। अभी मेट्रो केवल मनोरंजन का साधन बनकर रह गई है ।विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पूरे रूट के तैयार होने में अभी कम से कम दो साल का और समय लगेगा।
ई-बस सेवा अभी दूर की कौड़ी
सार्वजनिक परिवहन को सुधारने के दावे के साथ पीएम ई-बस सेवा के तहत 100 इलेक्ट्रिक बसें चलाने का निर्णय लिया गया था ।शहर अभी तक इन बसों को खड़ा करने के लिए डिपो तक तैयार नहीं कर पाया।

































