नई दिल्ली: गोल्डमैन सैक्स ने भारत की ग्रोथ के अनुमानों में कटौती कर दी है। अपने पूर्वानुमान में उसने आधा फीसदी की कमी की है। पश्चिम एशिया संघर्ष को उसने एक अलग तरह का तेल संकट बताया है। एक ऐसा संकट जो इस क्षेत्र में भारत की आर्थिक निर्भरता के दोनों छोरों को एक साथ प्रभावित करता है। इसके कारण रुपया एक साल के भीतर डॉलर के मुकाबले 95 तक पहुंचा सकता है।
गोल्डमैन सैक्स के एमडी और चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट शांतनु सेनगुप्ता ने नाउ पर कंपनी के विस्तृत परिदृश्य की रूपरेखा प्रस्तुत की। यह सिनेरियो 21 दिनों के लिए होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने, उस अवधि के दौरान तेल की कीमत लगभग 100 डॉलर और अप्रैल में धीरे-धीरे घटकर 85 डॉलर और वर्ष की दूसरी छमाही तक 70 डॉलर तक पहुंचने की स्थिति पर आधारित है।
क्यों यह तेल संकट अलग है?
भारत ने पहले भी ऊर्जा कीमतों में आए झटकों को झेला है। लेकिन, सेनगुप्ता का कहना है कि इस बार की घटना में स्ट्रक्चरल ट्विस्ट है। यह इसे संभालना और भी कठिन बना देता है। पिछली हर साइकिल में तेल की बढ़ती कीमतों ने मिडिल ईस्ट अर्थव्यवस्थाओं को समृद्ध किया। भारत को इस क्षेत्र से निर्यात की बढ़ती मांग और घर आने वाले अधिक धन (रेमिटेंस) के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से फायदा हुआ। अब यह संतुलन नहीं रह गया है।इस इंटीग्रेशन का पैमाना चौंकाने वाला है। सेनगुप्ता ने इस क्षेत्र पर भारत की निर्भरता के सटीक आंकड़े दिए हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि निर्यात, ऊर्जा आयात और धन पर एक साथ पड़ने वाली मार इस संकट को पहले के संकटों से गुणात्मक रूप से अलग क्यों बनाती है।
रुपया 95 के लेवल पर क्यों पहुंच सकता है?
वैसे तो राजकोषीय उपाय घरेलू विकास और महंगाई को काफी हद तक बचा सकते हैं। लेकिन, सेनगुप्ता साफ कहते हैं कि बाहरी खाते को उसी तरह से मैनेज नहीं किया जा सकता। भारत का चालू खाता घाटा (CAD) कैलेंडर वर्ष 2025 के स्तर से लगभग तीन गुना बढ़ने का अनुमान है। अब लगातार दूसरे वर्ष भुगतान संतुलन में घाटा होने की संभावना दिख रही है।
अगर संकट लंबा खिंचता है तो…
सेनगुप्ता बताते हैं कि अगर तेल की कीमतें एक तिमाही या उससे ज्यादा समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती हैं तो क्या होगा। सरकार की राजकोषीय रूप से इस झटके को झेलने की क्षमता पर लगातार दबाव बढ़ता जाएगा। – यानी पेट्रोल पंपों की कीमतों को स्थिर रखना और उर्वरक की पूरी लागत उठाना मुश्किल होगा। किसी न किसी मोड़ पर इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डालना जरूरी हो जाएगा।
अगर ऐसा होता है, तो RBI के लिए समीकरण काफी हद तक बदल जाएंगे। महंगाई अनुमान से ज्यादा बढ़ सकती है और साल के आखिर में ब्याज दरों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

































